
बिहार चुनाव में सियासी पारा बढ़ा हुआ है। तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करने के साथ ही बिहार में महागठबंधन के सहयोगी दलों के बीच चल रही उठा-पटक लगभग खत्म हो गई है। सातों सहयोगी दलों के नेताओं ने मंच से बढ़-चढ़कर एकजुटता का एलान किया। इससे पहले सीटों के बंटवारे को लेकर कांग्रेस, राजद और विआइपी में खींचतान चल रही थी लेकिन अब महागठबंधन में सबकुछ सामान्य हो गया है यह बताने की कोशिश की जा रही है।
पहली बार महागठबंधन ने तेजस्वी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर यह तय कर दिया है कि इस बार का बिहार चुनाव चाचा बनाम भतीजा होगा। इसमें कौन बाजी मारेगा, इसका फैसला बिहार की जनता तय करेगी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अशोक गहलोत ने एनडीए से पूछा कि उनका मुख्यमंत्री का चेहरा कौन है? गहलोत ने यह भी दावा किया कि महाराष्ट्र के एकनाथ शिंदे की तरह भाजपा बिहार में भी नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री नहीं बनाएगी। महागठबंधन बिहार की जनता के बीच यह संदेश देना चाहेगी कि चुनाव के बाद भाजपा अपने दल के किसी नेता को मुख्यमंत्री बनाएगी और नीतीश कुमार किनारे कर दिए जाएंगे।
बिहार में अति-पिछड़े व महिला समाज पर नीतीश कुमार की पकड़ मजबूत रही है। उनके गठबंधन को जीत दिलाने में इन दोनों समूहों का बड़ा योगदान रहा है। महिला वोटरों पर पकड़ मजबूत बनाने के लिए मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिलाओं के बैंक खाते में 10 – 10 हजार रुपए ट्रांसफर भी किये जा रहे हैं।
वहीं दूसरी ओर महागठबंधन के मुख्यमंत्री उम्मीदवार तेजस्वी यादव ने भी बिहार की जनता से कई वायदे किए हैं। खासकर बिहार के हर ऐसे परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का एलान किया है, जिनका कोई सदस्य सरकारी सेवा में नहीं है। वहीं विरोधी दल के नेता तेजस्वी के नौकरी देने के दावे पर सवाल उठाते हुए पूछ रहे हैं कि इसको पूरा करने के लिए पैसा कहां से आएगा?
वर्ष 2020 के चुनाव में चिराग पासवान ने खुद को प्रधानमंत्री का हनुमान घोषित करके भ्रम फैलाया था और इसका खामियाजा एनडीए को भुगतना पड़ा। इस बार के चुनाव में महागठबंधन बिहार की जनता को कैसे भरोसा दिला पाता है कि उनके सहयोगी दलों में एकजुटता है और वे एनडीए का मुकाबला कर सकते हैं वहीं दुसरी ओर एनडीए लालू के जंगलराज को मुद्दा बनाकर और नीतीश ही पुन: बिहार के मुख्यमंत्री बनेंगे का भरोसा दिलाकर बिहार की सत्ता पर काबिज होने का प्रयास करेगी।
बिहार चुनाव का असली रण: विकास बनाम विश्वास

अब जबकि चुनावी बिगुल बज चुका है, बिहार की राजनीति दो ध्रुवों पर खड़ी नज़र आ रही है—एक ओर नीतीश कुमार और भाजपा का गठबंधन है, जो ‘विकास के भरोसे’ जनता के बीच उतर रहा है; दूसरी ओर महागठबंधन है, जो बेरोज़गारी, महंगाई और सामाजिक न्याय जैसे पुराने मुद्दों को नए अंदाज़ में पेश करने की कोशिश कर रहा है। इस बार का बिहार चुनाव सिर्फ़ सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं, बल्कि दो राजनीतिक सोचों का टकराव है।
तेजस्वी यादव ने अपने अभियान में युवाओं को केंद्र में रखा है। उनका फोकस बेरोज़गारी, शिक्षा और पलायन जैसे मुद्दों पर है। वे बार-बार यह कहते नज़र आते हैं कि “बिहार को अब रोज़गार चाहिए, रेटोरिक नहीं।” वहीं नीतीश कुमार और भाजपा के नेता विकास योजनाओं, सड़कों, बिजली और महिला सशक्तिकरण के आंकड़े दिखा रहे हैं।
बिहार चुनाव में पहली बार सोशल मीडिया भी बड़ा हथियार बन गया है। फेसबुक, एक्स (ट्विटर) और इंस्टाग्राम पर दोनों ही खेमों के समर्थक पूरी ताकत से सक्रिय हैं। तेजस्वी यादव की डिजिटल टीम लगातार छोटे वीडियो, ग्राउंड रिपोर्ट और युवाओं के संदेश शेयर कर रही है। वहीं एनडीए की डिजिटल रणनीति केंद्र की योजनाओं को बिहार तक जोड़कर पेश करने पर केंद्रित है।
जातीय समीकरण और नए समीकरणों की तलाश
बिहार की राजनीति जातीय संतुलन के बिना अधूरी मानी जाती है। यादव, कुर्मी, मुसलमान, ब्राह्मण और अति-पिछड़ा वर्ग — ये सभी समूह इस बार के बिहार चुनाव के निर्णायक वोटर हैं। एनडीए जहां अति-पिछड़े और महिला वोट बैंक पर भरोसा कर रही है, वहीं महागठबंधन यादव–मुस्लिम समीकरण को फिर से सशक्त करने में जुटा है। कांग्रेस की भूमिका यहाँ दिलचस्प होगी — वह सीटों की संख्या भले कम रखे, पर अल्पसंख्यक और शहरी मतदाताओं को जोड़ने में मदद कर सकती है।
वहीं एलजेपी (पासवान गुट) और जाप (पप्पू यादव) जैसे छोटे दल भी समीकरण बिगाड़ने की ताकत रखते हैं। यदि ये दल किसी एक खेमे के वोट बैंक में सेंध लगाते हैं तो नतीजे अप्रत्याशित हो सकते हैं।
चुनावी वादों की हकीकत और जनता की अपेक्षा
दोनों गठबंधनों ने इस बार जनता को बड़े वादे किए हैं — नौकरियां, महिलाओं को आर्थिक सहायता, किसानों के लिए योजनाएँ, और शिक्षा सुधार। मगर जनता अब घोषणाओं से आगे बढ़कर ठोस नतीजे देखना चाहती है। 2020 के बाद से महंगाई, बेरोज़गारी और पलायन की समस्या और गहराई है। गाँव से लेकर शहर तक युवाओं की आवाज़ एक ही है — “रोज़गार चाहिए, राजनीति नहीं।”
तेजस्वी यादव के “एक परिवार–एक नौकरी” वाले वादे को लेकर चर्चाएँ जोरों पर हैं, जबकि एनडीए इस दावे को अव्यावहारिक बताते हुए खुद को भरोसेमंद विकल्प के रूप में पेश कर रहा है। इस बीच, राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस बार का बिहार चुनाव पूरी तरह युवा और महिला मतदाताओं के मूड पर निर्भर करेगा।
नतीजे क्या संकेत देंगे
यदि महागठबंधन इस बार सत्ता में आता है, तो यह सिर्फ़ राजनीतिक परिवर्तन नहीं, बल्कि एक पीढ़ीगत बदलाव भी होगा। वहीं अगर नीतीश कुमार एक बार फिर मुख्यमंत्री बनते हैं, तो यह उनके “सुशासन” मॉडल की पुनर्पुष्टि मानी जाएगी।
कुल मिलाकर, बिहार चुनाव इस बार किसी एक पार्टी की नहीं, बल्कि जनता के धैर्य, भरोसे और उम्मीद की परीक्षा बन चुका है। कौन जीतेगा और कौन हारेगा, यह तो नतीजे बताएंगे, लेकिन इतना तय है कि इस बार बिहार की जनता खामोश नहीं, बहुत सजग है — और यही इस लोकतंत्र की असली ताकत है।
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