
झरिया : एक जगह हो तो कहें दर्द यहां होता है
झरिया यानि काले हीरे की नगरी पूरे देश में कोकिंग कोल के जरिए अपनी पहचान बनाने वाली झरिया का नाम किसी जमाने में आकाशवाणी की चर्चित गायिका रही कमला झरिया के नाम पर पड़ा था। तब से आज तक काले हीरे की यह नगरी हमेशा से सुर्खियों में रही पहले कोकिंग कोल के लिए और अब आग का दरिया के लिए। झरिया का दर्द यह है कि अपनी कोख में आग का दरिया समेटे अपनी गोद में रहने वाले अपने बच्चों की बदहाली और बेबसी देखना ही उसकी नियति बन गई है।

आजादी के पहले जब यहां अंग्रेजों का राज था तब उनकी बर्ड कंपनी के द्वारा यहां कोयला खनन का कार्य किया जाता था और उसी जमाने में वर्ष 1916 में माईनिंग के मानदंडों में हुई चूक के कारण कोयले के एक विशाल भंडार में आग लग गयी और फिर उस आग ने विकराल रूप धारण किया जिसे बुझाना शायद अंग्रेजों के वश में नहीं था। भौरा कोलियरी से शुरू हुई इस आग ने धीरे-धीरे अपना दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया। अंग्रेजों के जाने के बाद आजाद हिंदुस्तान में भी इस आग को बुझाने के लिए दर्जनों योजनाएं बनाई गई और करोड़ों खर्च किए गए परंतु नतीजा ढाक के तीन पात ही निकला।
आज एक शताब्दी के बाद भी यह आग सुरसा के भांति अपने मुंह का दायरा बढ़ाती ही चली जा रही है। यह तो हुई आग की बात अब इस आग के दुष्प्रभाव और उससे प्रभावित लोगों की बात करें तो मानवीय संवेदना तार-तार होती दिखाई देगी। हालात यह है कि संपूर्ण झरिया ज्वालामुखी के ढेर पर बसी हुई है और झरियावासी आग, जहरीली गैस और भूधंसान का दंश झेलने को विवस हैं। इनकी सुरक्षा और पुनर्वास की बात उतनी ही खोखली है जितनी कि झरिया की धरती।
भूमिगत आग का दायरा काफी बढ़ जाने के कारण पूरे इलाके में जिसमें झरिया सहित आसपास के दर्जनों क्षेत्र शामिल है लगातार भूधंसान की घटनाएं होने लगी। यदा कदा जहरीली गैस का रिसाव भी होने लगा। कोयला प्रबंधन इससे बचाव के नाम पर करोड़ों करोड़ रुपए उड़ाता रहा परंतु नतीजा सिफर ही रहा तब हार मानकर इन तमाम क्षेत्रों में बसी आबादी के पुनर्वास की योजना बनाई गई फिर करोड़ों खर्च करके आवास बनाए गए और कुछ हद तक लोगों को वहां बसाया भी गया लेकिन यह पुनर्वास प्रभावित आबादी का 10 प्रतिशत मात्र ही है। ऐसे में बाकी के 90 प्रतिशत आबादी आज भी जिंदगी और मौत के बीच रोज मैच खेल रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट (2017 के एक PIL में) :
संयुक्त रूप से केंद्र सरकार, मंज़र सरकारी निकाय (JRDA) और BCCL को सहायता देने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने प्राथमिकता दी प्रभावित परिवारों के तत्काल पुनर्वास को और फिर वास्तविक स्थिति की पहचान को, क्योंकि जमीन पर हालात अस्पष्ट थे।

अलग-अलग घटनाओं में इनके सैकड़ो आवास जमींदोज हो चुके हैं हजारों की संख्या में जाने जा चुकी है लेकिन समाधान संभव नहीं हो पा रहा। अलबत्ता आग पर काबू पाने या फिर पुनर्वास के नाम पर करोड़ों – करोड़ की बंदरबांट अवश्य हुई और अब भी जारी है।
Reuters रिपोर्ट के अनुसार
डीडी रामानंदन ने कहा कि झरिया कोयले पर आधारित एकमुश्त इकाई है — यहां कोई औद्योगिक वैरायटी नहीं, इसलिए लोगों के पास छोड़ने के लिए कोई अन्य आय का मार्ग नहीं है।
शिव बालक पासवान ने उल्लेख किया कि ओपन-कास्ट खनन ने आग को और बढ़ावा दिया, फिर भी यह इलाका स्थानीय लोगों के लिए एकमात्र आजीविका स्रोत बना हुआ है।

झरिया पुनर्वास का मास्टर प्लान 2009 में बनाया गया लेकिन आज 16 वर्ष बीत जाने के बाद भी इस प्लान की उपलब्धि यह है कि सिर्फ 3200 परिवारों को बेलगड़िया नामक कॉलोनी बनाकर बसाया गया जो कि कुल प्रभावित आबादी का 10 प्रतिशत भी नहीं है बाकि की एक बड़ी आबादी खोखली हो चुकी जमीन और आग की लपटों के बीच आज भी रहने को विवश हैं। कोयला कंपनी, जनप्रतिनिधि या फिर सरकार ही क्यों ना हो सभी सिर्फ अपना उल्लू सीधा करने में व्यस्त है। जमीनी स्तर पर समाधान के लिए कोई कुछ नहीं कर रहा।
देखा जाए तो झरिया की त्रासदी केवल आग या भू-धंसान की नहीं है, यह लोगों के विस्थापन, उनके अधिकारों और प्रशासनिक लापरवाही की लंबी कहानी है। जिन इलाकों में यह आग लगी, वहां की आबादी दशकों से खतरे के साये में जी रही है। यह तथ्य कि इतने लंबे समय में समाधान नहीं निकला, यह बताता है कि झरिया का दर्द केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानवीय असंवेदनशीलता का भी प्रतीक है। इस शहर में रहने वाले लोगों के घर टूटे, उनकी जमीन खोखली हो गई, बच्चे असुरक्षित माहौल में बड़े हो रहे हैं। जिन योजनाओं का वादा किया गया, वे भ्रष्टाचार और राजनीतिक हितों में उलझ कर रह गईं।
झरिया की भूमिगत आग और पुनर्वास की विफलता को लेकर स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों ने कई बार चिंता जताई है। कई निवासियों का कहना है कि सरकार और कोल कंपनियां सिर्फ योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित हैं, जबकि जमीनी स्तर पर हालात जस के तस बने हुए हैं।
आज भी लोग बेलगड़िया कॉलोनी के अलावा बाकी खतरनाक इलाकों में रहने को मजबूर हैं। प्रशासन की नाकामी साफ दिखाई देती है। बड़े पैमाने पर होने वाले हादसे भी किसी को झकझोरने में असफल रहे हैं। आग पर काबू पाने के प्रयास, पुनर्वास योजनाएं और भारी भरकम बजट सब किताबों तक सीमित हो गए हैं। हर योजना में पैसा बहा, लेकिन परिणाम सिर्फ कुछ कागजी उपलब्धियां।
इसलिए झरिया की यह कहानी केवल कोयले की नगरी से आग की नगरी बनने की कहानी नहीं है। यह संवेदनाओं के टूटने, सिस्टम की नाकामी और हजारों लोगों के जीवन के साथ हो रहे खिलवाड़ की गवाही है। यह एक ऐसा शहर है जो अपने ही सीने में आग समेटे हुए है और पीढ़ियों को जलते हुए देख रहा है। सवाल सिर्फ एक है – आखिर इस आग को कौन बुझाएगा?
FAQs
Q1. झरिया को “काले हीरे की नगरी” क्यों कहा जाता है?
क्योंकि यहां देश का प्रमुख कोकिंग कोल उत्पादन होता है, जिसे काले हीरे के रूप में जाना जाता है।
Q2. झरिया में आग कब और कैसे लगी?
1916 में अंग्रेजों की बर्ड कंपनी के खनन के दौरान मानकों की चूक से भूमिगत कोयले में आग लगी, जो आज तक जारी है।
Q3. झरिया की आग से सबसे बड़ा खतरा क्या है?
भूमिगत आग के फैलाव से जमीन धंसने, जहरीली गैस और विस्फोट जैसी घटनाओं का खतरा लगातार बना रहता है।
Q4. पुनर्वास योजना की स्थिति क्या है?
2009 में मास्टर प्लान बना, लेकिन 16 साल बाद भी सिर्फ करीब 3200 परिवारों को बेलगड़िया कॉलोनी में बसाया जा सका है।
Q5. झरिया की समस्या का समाधान कब और कैसे हो सकता है?
सख्त प्रशासनिक निगरानी, पारदर्शी योजनाएं, आधुनिक तकनीक और राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ ही इस त्रासदी को कम किया जा सकता है।
Suggested External Resources
भारत में है एक ऐसी जगह जो 108 साल से लगातार जल रही है, फिर भी आग के बीच रहते हैं लोग, घूमने की न करें गलतीhttps://navbharattimes.indiatimes.com/travel/destinations/jharia-burning-coal-fields-is-still-burning-people-living-here-know-about-the-nearby-tourist-places/articleshow/116595226.cms
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