UPI पर MDR की नई व्यवस्था

UPI को भारत में डिजिटल पेमेंट की सबसे बड़ी कामयाबियों में गिना जाता है। छोटी दुकान से लेकर बड़े कारोबारी तक आज इसका इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन अब UPI के कुछ बड़े ट्रांजैक्शन पर MDR यानी Merchant Discount Rate लागू करने की प्रस्तावित व्यवस्था ने नई बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ शुल्क लगाने का नहीं है, बल्कि यह भी है कि इसकी पूरी व्यवस्था कितनी आसान और व्यावहारिक होगी।

द हिंदू के संपादकीय “Complex priorities: On UPI transactions, MDR charges” में इसी मुद्दे पर सवाल उठाए गए हैं। संपादकीय के मुताबिक, नई व्यवस्था को लेकर नियम इतने अलग-अलग हिस्सों में बांटे गए हैं कि इसका फायदा कम और उलझन ज्यादा पैदा हो सकती है।

नई दरें 15 अक्टूबर से ₹2,000 या उससे ज्यादा के कुछ व्यापारी UPI भुगतान पर लागू होने की बात कही गई है। यह कुल UPI लेनदेन का करीब 2.5 फीसदी हिस्सा बताया गया है। यानी रोजमर्रा के छोटे UPI पेमेंट इस व्यवस्था के दायरे से बाहर रहेंगे।

लेकिन असली पेच इसके बाद शुरू होता है।

नई व्यवस्था में छोटे कारोबारियों के लिए अलग प्रावधान हैं। जिन व्यापारियों का मासिक कारोबार ₹1 लाख से कम है, उन्हें MDR से छूट दी गई है। इसके अलावा कुछ जरूरी क्षेत्रों के लिए सामान्य 0.4 फीसदी की जगह अलग फ्लैट शुल्क रखने की बात है। वहीं ₹2,000 से ऊपर के कैपिटल मार्केट पेमेंट के लिए अलग दर होगी।

यानी एक ही UPI सिस्टम में अलग-अलग तरह के भुगतान के लिए अलग नियम होंगे। यही बात संपादकीय की सबसे बड़ी चिंता है।

छोटे दुकानदारों के लिए सबसे बड़ा सवाल

मान लीजिए किसी छोटे दुकानदार का कारोबार एक महीने में ₹1 लाख से थोड़ा ज्यादा हो गया। तब उस पर कौन सा नियम लागू होगा? उसकी पात्रता कौन तय करेगा? बैंक हर महीने उसके कारोबार की निगरानी कैसे करेंगे?

यही सवाल छोटे कारोबारियों के लिए परेशानी पैदा कर सकते हैं।

अगर बैंकों को हर व्यापारी के लेनदेन और मासिक कारोबार की लगातार निगरानी करनी पड़ेगी, तो इसके लिए अलग सिस्टम और अतिरिक्त लागत की जरूरत पड़ सकती है। दूसरी तरफ, अगर नियमों की स्थिति साफ नहीं रही तो छोटे कारोबारी UPI पेमेंट स्वीकार करने से भी बच सकते हैं।

UPI की सबसे बड़ी ताकत उसकी सरलता रही है। इसलिए सवाल यह है कि MDR लागू करने के चक्कर में कहीं वही सरल व्यवस्था जटिल तो नहीं हो जाएगी।

ग्राहक से शुल्क लेने पर रोक, लेकिन निगरानी कैसे होगी?

सरकार ने बैंकों को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि व्यापारी MDR का बोझ सीधे ग्राहकों पर न डालें।

लेकिन यहां भी एक व्यावहारिक सवाल है। अगर कोई दुकानदार UPI भुगतान पर अलग से शुल्क नहीं लेता, लेकिन अपनी वस्तुओं या सेवाओं की कीमत में मामूली बढ़ोतरी कर देता है, तो बैंक इसका पता कैसे लगाएंगे?

हर दुकान के सामान की कीमतों की लगातार निगरानी करना आसान काम नहीं है। यही वजह है कि नियम लागू करने की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

हर महीने ₹2,400 करोड़ तक राजस्व का अनुमान

MDR से भुगतान व्यवस्था से जुड़े पक्षों को हर महीने अधिकतम करीब ₹2,400 करोड़ तक का राजस्व मिलने का अनुमान बताया गया है। हालांकि अलग-अलग छूट और फ्लैट रेट के कारण वास्तविक रकम इससे कम हो सकती है।

सरकार की ओर से अमेरिकी क्रेडिट कार्ड कंपनियों के दबाव में यह व्यवस्था लाने की बात से इनकार किया गया है। लेकिन संपादकीय में यह सवाल उठाया गया है कि उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर इस व्यवस्था का बड़ा वित्तीय लाभ निजी बैंकों और अमेरिकी स्वामित्व वाले कुछ UPI ऐप्स को मिल सकता है।

यह एक संपादकीय विश्लेषण है, इसलिए इससे जुड़े लाभार्थियों और प्रभावों को अंतिम निष्कर्ष के बजाय उसी संदर्भ में देखना जरूरी है।

क्या RBI उठा सकता है UPI का खर्च?

द हिंदू के संपादकीय में एक वैकल्पिक रास्ते की बात भी की गई है। सुझाव है कि रिजर्व बैंक अपनी सालाना अतिरिक्त कमाई यानी surplus में से कुछ राशि का इस्तेमाल देश के इस महत्वपूर्ण डिजिटल पेमेंट इंफ्रास्ट्रक्चर की लागत उठाने के लिए कर सकता है।

इससे UPI के इस्तेमाल पर सीधे शुल्क लगाने की जरूरत कम हो सकती है।

हालांकि यह एक नीतिगत सुझाव है, न कि वर्तमान व्यवस्था का हिस्सा।

UPI की सरलता बनी रहे, यही सबसे बड़ा सवाल

UPI ने डिजिटल भुगतान को इसलिए तेजी से लोगों तक पहुंचाया क्योंकि इसे इस्तेमाल करना बेहद आसान है। अब अगर बड़े लेनदेन पर MDR लागू किया जाता है, तो व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसे व्यापारी, बैंक और ग्राहक आसानी से समझ सकें।

संपादकीय का मुख्य तर्क भी यही है कि अगर सरकार MDR लागू करने के फैसले पर आगे बढ़ती है तो पहले नियमों को सरल और स्पष्ट करना जरूरी है। छोटे कारोबारियों के लिए यह खास तौर पर महत्वपूर्ण है।

GST का अनुभव भी बताता है कि जटिल नियमों का सबसे ज्यादा असर अक्सर छोटे कारोबारियों पर पड़ता है। UPI के मामले में भी यही चुनौती सामने आ सकती है।

इसलिए MDR की बहस सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं है कि शुल्क कितना होगा। असली सवाल यह है कि कौन शुल्क देगा, किसे छूट मिलेगी, बैंक इसकी निगरानी कैसे करेंगे और पूरी व्यवस्था छोटे कारोबारियों के लिए कितनी आसान रहेगी।

यही वे सवाल हैं जिनका स्पष्ट जवाब MDR व्यवस्था लागू होने से पहले मिलना जरूरी होगा।

लेखक: वकार अहमद

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