
रांची: झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की मां और दिवंगत दिशोम गुरु शिबू सोरेन की पत्नी रूपी सोरेन का बुधवार, 7 अक्टूबर को निधन हो गया। वह 80 वर्ष की थीं। रांची के बरियातू स्थित हिल व्यू हॉस्पिटल एंड रिसर्च सेंटर में रात करीब साढ़े आठ बजे उन्होंने अंतिम सांस ली। सांस लेने में तकलीफ के बाद उन्हें 18 सितंबर को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। हालत बिगड़ने पर उन्हें जीवनरक्षक प्रणाली पर रखा गया था।
रूपी सोरेन के निधन की खबर सामने आते ही झारखंड में शोक की लहर दौड़ गई। सोरेन परिवार, झारखंड मुक्ति मोर्चा के कार्यकर्ताओं और उनके लंबे राजनीतिक सफर से जुड़े लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए यह निजी तौर पर बेहद मुश्किल समय है। उनके पिता और झारखंड आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल शिबू सोरेन का निधन अगस्त 2025 में हुआ था। करीब एक साल बाद अब उन्होंने अपनी मां को भी खो दिया।
हेमंत सोरेन ने मां के निधन के बाद भावुक संदेश में लिखा कि पिता के जाने के बाद मां ही उनका सबसे बड़ा सहारा थीं और अब वह सहारा भी प्रकृति की गोद में विलीन हो गया है।
शिबू सोरेन के संघर्ष में साथ खड़ी रहीं रूपी
रूपी सोरेन की पहचान सिर्फ एक बड़े राजनीतिक परिवार की महिला के तौर पर नहीं थी।
उनकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा उस दौर में गुजरा, जब शिबू सोरेन अलग झारखंड राज्य और आदिवासी समाज के अधिकारों को लेकर आंदोलन में सक्रिय थे।
शिबू सोरेन अक्सर घर से बाहर रहते थे। आंदोलन, यात्राओं और संघर्ष के उस दौर में परिवार की जिम्मेदारी रूपी सोरेन के कंधों पर थी। बच्चों की परवरिश से लेकर घर-गृहस्थी तक उन्होंने संभाली।
कई मौकों पर शिबू सोरेन को पुलिस और प्रशासन से बचते हुए लंबे समय तक बाहर रहना पड़ा। ऐसे समय में परिवार को संभालना आसान नहीं था। रूपी सोरेन ने न सिर्फ बच्चों को पाला, बल्कि मुश्किल हालात में परिवार की जमीन-जायदाद और घर की जिम्मेदारियां भी संभालीं।
उनके बारे में सामने आई कई पुरानी घटनाएं बताती हैं कि वह स्वभाव से काफी मजबूत थीं। परिवार के लोगों के अनुसार, जब महाजनों की ओर से जमीन को लेकर दबाव बनाया गया, तब भी उन्होंने पीछे हटने के बजाय उसका विरोध किया। एक पुराने प्रसंग में उनके हंसुआ लेकर खेत की तरफ पहुंचने की बात भी सामने आती है।
जब पुलिस शिबू सोरेन को खोज रही थी
शिबू सोरेन के संघर्ष के दौर की एक घटना रूपी सोरेन के स्वभाव को समझने के लिए अक्सर याद की जाती है।
जब पुलिस शिबू सोरेन को खोज रही थी और गांव में उनसे उनके बारे में पूछताछ की गई, तब रूपी सोरेन ने कथित तौर पर साफ कहा था कि यह शिबू सोरेन का घर नहीं, बल्कि रूपी सोरेन का घर है। जहां हैं, वहीं जाकर तलाश कीजिए।
यह घटना बताती है कि जिस दौर में शिबू सोरेन राजनीतिक और सामाजिक संघर्षों में व्यस्त थे, उस समय घर की जिम्मेदारी संभालने वाली उनकी पत्नी भी हालात से घबराने वाली नहीं थीं।
इसी संघर्ष के बीच उनके बच्चों की परवरिश हुई। बड़े बेटे दुर्गा सोरेन राजनीति में आए। हेमंत सोरेन आगे चलकर झारखंड के मुख्यमंत्री बने और छोटे बेटे बसंत सोरेन भी राजनीति में सक्रिय हुए।
रूपी सोरेन खुद भी चुनावी मैदान में उतरी थीं
रूपी सोरेन का सार्वजनिक जीवन सिर्फ परिवार तक सीमित नहीं रहा।
1999 में उन्होंने दुमका लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। उस समय झारखंड अलग राज्य नहीं बना था और यह इलाका बिहार का हिस्सा था।
यह चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि उनके सामने भाजपा के बाबूलाल मरांडी थे। मुकाबला बेहद करीबी रहा।
निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक, बाबूलाल मरांडी को 2,01,141 वोट मिले थे, जबकि रूपी सोरेन को 1,96,493 वोट मिले। यानी दोनों के बीच सिर्फ 4,648 वोट का अंतर रहा।
रूपी सोरेन चुनाव नहीं जीत सकीं, लेकिन इस मुकाबले ने यह जरूर दिखाया कि वह उस समय सोरेन परिवार की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने के लिए सीधे मैदान में उतरी थीं।
इसके बाद उन्होंने सक्रिय चुनावी राजनीति से दूरी बनाए रखी। लेकिन परिवार और झामुमो से उनका जुड़ाव बना रहा।
शिबू सोरेन के निधन के बाद एक भावुक अध्याय
4 अगस्त 2025 को शिबू सोरेन का निधन हुआ था। उनके जाने के बाद रूपी सोरेन ने एक बार फिर परिवार के लिए सबसे बड़ा सहारा खो दिया।
लेकिन पति की मौत के करीब दस महीने बाद उनकी एक तस्वीर पूरे देश ने देखी।
23 जून 2026 को राष्ट्रपति भवन में शिबू सोरेन को मरणोपरांत पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। यह सम्मान उनकी पत्नी रूपी सोरेन ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से ग्रहण किया था। उस समय उनकी तबीयत पहले से ठीक नहीं थी और वह व्हीलचेयर पर थीं।
यह शायद उनकी सार्वजनिक जिंदगी के आखिरी बड़े मौकों में से एक था।
जिस व्यक्ति के साथ उन्होंने जिंदगी के लंबे संघर्ष देखे, उसी व्यक्ति का सम्मान ग्रहण करने के लिए वह राष्ट्रपति भवन पहुंचीं।
और इसके कुछ ही महीनों बाद वह भी इस दुनिया से चली गईं।
बीमारी के आखिरी दिनों में क्या हुआ?
रूपी सोरेन लंबे समय से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से जूझ रही थीं। बेहतर इलाज के लिए उन्हें सितंबर में हैदराबाद भी ले जाया गया था। वहां उनकी हालत में कुछ सुधार हुआ, लेकिन रांची लौटने के बाद फिर तबीयत बिगड़ गई। इसके बाद उन्हें 18 सितंबर को हिल व्यू अस्पताल में भर्ती कराया गया।
7 अक्टूबर को उनकी हालत अचानक ज्यादा गंभीर हो गई। चिकित्सकों ने उनकी निगरानी बढ़ा दी और आखिरकार रात करीब साढ़े आठ बजे उनका निधन हो गया।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी मां की तबीयत बिगड़ने की जानकारी मिलने के बाद अस्पताल पहुंचे थे।
नेमरा में होगी अंतिम विदाई
रूपी सोरेन का अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव नेमरा में किया जा रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, उनका पार्थिव शरीर गुरुवार सुबह करीब 11 बजे नेमरा पहुंचाया जाना था, जहां लोगों को अंतिम दर्शन का अवसर दिया जाएगा।
इसके बाद नाड़ी दरहा घाट पर राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया जाएगा। प्रशासन ने बड़ी संख्या में लोगों के पहुंचने की संभावना को देखते हुए सुरक्षा और यातायात की व्यवस्था की है।
नेमरा वही गांव है, जहां से शिबू सोरेन और उनके परिवार की राजनीतिक कहानी आगे बढ़ी।
अब उसी जगह रूपी सोरेन को भी अंतिम विदाई दी जाएगी।
एक पीढ़ी का अंत
रूपी सोरेन के निधन को सिर्फ एक राजनीतिक परिवार की निजी क्षति के तौर पर देखना उनकी पूरी जिंदगी को छोटा कर देना होगा।
वह उस दौर की गवाह थीं, जब झारखंड राज्य का सपना अभी आंदोलन था। उन्होंने शिबू सोरेन के संघर्ष के दिन देखे, परिवार की जिम्मेदारियां उठाईं, बच्चों को बड़ा किया, खुद चुनाव लड़ा और बाद में अपने पति की राजनीतिक विरासत को करीब से देखा।
उन्होंने अपने बड़े बेटे दुर्गा सोरेन को असमय खोया। फिर पति शिबू सोरेन को खोया। और अब 80 साल की उम्र में वह खुद भी चली गईं।
हेमंत सोरेन के लिए यह लगातार दूसरा बड़ा निजी आघात है।
शिबू सोरेन के जाने के बाद जिस मां को उन्होंने अपना सबसे बड़ा सहारा बताया, वही मां अब उनके साथ नहीं हैं।
रूपी सोरेन शायद झारखंड की राजनीति में शिबू सोरेन या हेमंत सोरेन जितना बड़ा राजनीतिक नाम नहीं रहीं, लेकिन सोरेन परिवार की कहानी को उनके बिना समझना भी मुश्किल है।
क्योंकि जब शिबू सोरेन आंदोलन की लड़ाई लड़ रहे थे, तब घर को संभालने वाली महिला रूपी सोरेन थीं।
और जब सोरेन परिवार की अगली पीढ़ी राजनीति में आगे बढ़ रही थी, तब उसके पीछे खड़ी मां भी वही थीं।
उनके निधन के साथ सोरेन परिवार की उस पीढ़ी का एक अहम अध्याय खत्म हो गया, जिसने झारखंड आंदोलन के शुरुआती संघर्षों से लेकर आज की राजनीति तक का लंबा सफर अपनी आंखों से देखा था।
लेखक: वकार अहमद
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